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कविता : लॉकडाउन के पहाड़

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  चलो कहीं फिर दूर चलें,  रेतीले सागर के ऊपर, पथरीले मंजर पर ढूंढें,  कुछ सपने , शांति सरीखे हम। उन पर्वत शिखरों से मिलने,  फिर भाग चलें , फिर दौड़ चलें, उन अनदेखे विस्तारों से,  फिर आंख - मिचौली कर लें हम। उस सतरंगी से पानी की,  वो झील बुलाती है अक्सर उत्तुंग हिमालय की चोटी,  से नाता जोड़ें चलके हम। अब मत रोको , रोकोना तुम,  हमको कोरोना रोको ना को को रो रो, कोरोना तु्म,  जाने दो , नहीं रुकेंगे हम। - नरविजय यादव

चार महीने हो गये। बाहर की दुनिया से कटे हुए। आज तो शहर में गेड़ी ही लगा डाली।

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चार महीने हो गये। बाहर की दुनिया से कटे हुए। शुरू का एक माह तो ऐसा रहा कि दिन और रात का ही पता नहीं चलता था। दूसरे महीने खिड़की से तनिक धूप दिखी और बिल्डिंग का एक रूखा सा हिस्सा। उसे ही देर तक निहारता रहा था। चलना तो छोड़िए, बैठना ही एक सपना था। ग्यारह बार मूवमेंट हुआ, लेकिन स्ट्रेचर पर लेटे-लेटे। घर आने के बाद भी बैड से हिलना मुश्किल था। पिछले कुछ हफ्तों में हालात सुधरे। आज तो शहर में गेड़ी ही लगा डाली। माउंट व्यू के सामने काॅफी पी। लेक देखी। सड़कों से गुजरते हुए ऐसा लगा मानो वृक्षों और हरियाली के बीच तैरते हुए जा रहे हों। यही तो विशेषता है चंडीगढ़ की। वैक्सीन लगवाने के बाद खुशबू ने कहा, "डैडी मौसम तो गेड़ी का हो रहा है, चलें?" मेरे मौन को ही मेरी स्वीकृति मान बेटी ने कार सुखना की ओर घुमा दी। लगा ही नहीं कि कई माह के बाद घूम रहा हूं। शरीर स्वस्थ हो रहा है। मन तो वैसे भी हमेशा उल्लास से भरा रहता है। ईश्वर से प्रार्थना है कि सबका जीवन हंसी-खुशी से भरा रहे! भारत खुशहाल रहे! जीव-जंतु स्वच्छंद घूमें, जिएं! अफगानिस्तान में हालात सुधरें, अमन कायम हो! - नरविजय यादव

गाटा लूप का बोतल वाला भूत

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लद्दाख के निर्जन पहाड़। मीलों तक आदमी नहीं। चिड़िया नहीं। जानवर नहीं। बस, आप और सड़क। कहीं-कहीं तो सड़क भी नहीं। सिर्फ ऊबड़-खाबड़ रास्ता। हिमालय का ठंडा रेगिस्तान। जीवन कठिन है इस भूभाग में। दिन तो खूबसूरत नजारे देखते बीत जाता है। लेकिन रात का क्या ? तब तो डर लगता है। भूत भी दिख सकता है। बशर्ते मन कमजोर हो। ऐसा ही एक स्थान है गाटा लूप। बीस तीखे मोड़ों वाली ऊंची चढ़ाई। मनाली से लेह के रास्ते में। नकीला पास से पहले। प्लास्टिक की सैकड़ों बोतलों का ढेर। बिस्किट के इक्का-दुक्का पैकेट भी। लाल झंडियों वाली एक गुफा जैसा कुछ। यह बोतल वाले भूत का बसेरा है। या कह लीजिए एक मंदिर। स्थानीय लोगों ने इसे मंदिर जैसा स्वरूप दिया है। हमने ड्राइवर से पूछा बोतलों का राज। पानी की बोतलें। इतनी सारी। आखिर क्यों? जवाब मिला, यहां एक प्यासा भूत रहता है। रात को गुजरते ट्रक ड्राइवरों को परेशान करता है। इस चक्कर में अनेक हादसे हो चुके हैं। भूत को खुश रखने के लिए ट्रक ड्राइवर यहां मिनरल वाटर की बोतलें रख देते हैं। कभी कभार बिस्किट भी। फिर, वे गुजर जाते हैं यहां से। सुरक्षित। किस्सा कुछ यूं है। कुछ साल पूर...

योगा फेस्टिवल को सस्ता, सुलभ और व्यापक करने की जरूरत

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ऋषिकेश में वार्षिक इंटरनेशनल योगा फेस्टिवल 1 मार्च को शुरू हो गया। एक सप्ताह चलने वाला यह उत्सव दो-तीन अलग-अलग स्थानों पर आयोजित होता है।  राजनेताओं एवं विदेशियों की उपस्थिति के चलते परमार्थ निकेतन का फेस्टिवल अधिक चर्चा में रहता है। हालांकि, उत्तराखंड सरकार का पर्यटन विभाग इसे अपने 'गंगा रिसॉर्ट' में आयेाजित करता है। इस बार, होटल 'योग वशिष्ठ' में भी एक लघु आयोजन किया गया है। पिछले कई वर्षों से सक्रिय रहा होटल 'गंगा किनारे' इस बार दौड़ से बाहर है।  Time to Prayer.  (Photo: Parmarth Niketan) परमार्थ  निकेतन  की वेबसाइट पर रेट लिस्ट नहीं दी गयी है। हालांकि, यहां भारतीयों से प्रति व्यक्ति कम से कम रु. 10,000 और विदेशियों से प्रति व्यक्ति रु. 50,000 या अधिक लिये जाते हैं। आश्रम का कमरा, भोजन एवं योग कक्षाओं में भागीदारी इस शुल्क में शामिल  है। सरकारी आयोजन में प्रतिदिन रु. 1,000 फीस देकर सिर्फ कार्यक्रमों में भाग लिया जा सकता है। रहने का शुल्क अलग से है, जो रु. 7,500 से लेकर रु. 16,000 तक के पैकेज के रूप में मिलता है।  The par...

लद्दाख : ठंडे रेगिस्तान में सडक़ का सफर

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लद्दाख यानी जन्नत। एक ख्वाब। छोटा तिब्बत। दुनिया की छत। जम्मू-कश्मीर का बड़ा हिस्सा। बौद्ध धर्म का महत्वपूर्ण ठिकाना। पाकिस्तान व चीन का निशाना। आम हिंदुस्तानी जिसके बारे में ठीक से नहीं जानते। जहां सडक़ें सात माह तक बर्फ जमी होने के कारण बंद रहती हैं। जहां हिमालय की बर्फीली चोटियां एकदम पास होती हैं। सडक़ के दोनों ओर जहां सिर्फ बर्फ की दीवारें होती हैं। बरसात में जहां बारिश नहीं होती। जहां पहाड़ों पर घास का एक तिनका तक नहीं दिखता। जिसे लोग ठंडा रेगिस्तान कहते हैं। जहां चाय याक के दूध या फिर डिब्बाबंद दूध से बनती है। आकाश जहां नीला दिखता है। ऑक्सीजन जहां विरल होती है। जहां पर्यटक तेज चलते ही हांफने लगते हैं। वो लद्दाख। खबर है कि श्रीनगर-लेह राजमार्ग फिर बंद हो गया है। भूस्खलन की वजह से यातायात ठप है। कुछ दिन लग जाएंगे रास्ता साफ करते। काफी संख्या में लोग श्रीनगर से कारगिल होते हुए लेह पहुंचते हैं। सडक़ मार्ग से लेह जाने का यह एक सुगम रास्ता है। तीन दिन लग जाते हैं। वहां रात में सडक़ यात्रा की अनुमति नहीं होती। रात में विश्राम करना पड़ता है। परंतु यह यात्रा होती बेहद रोमांचक ह...