संदेश

hills लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कविता : लॉकडाउन के पहाड़

चित्र
  चलो कहीं फिर दूर चलें,  रेतीले सागर के ऊपर, पथरीले मंजर पर ढूंढें,  कुछ सपने , शांति सरीखे हम। उन पर्वत शिखरों से मिलने,  फिर भाग चलें , फिर दौड़ चलें, उन अनदेखे विस्तारों से,  फिर आंख - मिचौली कर लें हम। उस सतरंगी से पानी की,  वो झील बुलाती है अक्सर उत्तुंग हिमालय की चोटी,  से नाता जोड़ें चलके हम। अब मत रोको , रोकोना तुम,  हमको कोरोना रोको ना को को रो रो, कोरोना तु्म,  जाने दो , नहीं रुकेंगे हम। - नरविजय यादव

जरूरत है जिम्मेदार पर्यटन की

चित्र
घूमने-फिरने से समझदारी बढ़ती है। विकास होता है। बोरियत पीछे छूटती है। यदि पर्यटन पहाड़ों पर हो तब तो कहने ही क्या। मन शांत होता है। प्रकृति का संग मिलता है। नवीन विचार आते हैं। तन-मन नयी ऊर्जा से भर जाता है। कायदे में तो हर किसी को साल में कम से कम एक बार हफ्ते-दस दिन के लिए किसी दूर स्थान पर घूमने चले जाना चाहिए। ऐसे ही, हर तीन-चार महीने में कोई छोटी यात्रा कर लेनी चाहिए।  यदि अच्छी सोच लेकर पर्यटन पर निकला जाये तो आनंद ही आनंद है। अपना भी भला और जहां आप जा रहे हैं वहां के निवासियों का भी भला। परंतु कुछ मनचले लोग पर्यटन को मनमाने और अराजक व्यवहार का परमिट मान बैठते हैं। अनैतिक ढंग से पैसा कमाने वाले लोगों में प्रकृति व आमजन को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति अधिक पायी जाती है। ऐसे लोग सडक़ों, होटलों और पर्यटन स्थलों पर दिक्कतें खड़ी करने से नहीं चूकते।  उत्तराखंड में केदारनाथ, बद्रीनाथ एवं हेमकुंड जैसे पवित्र स्थानों पर जो कुछ हुआ है, उससे हमें बहुत सारे सबक लेने की जरूरत है। ये देव स्थान हैं। परंतु साधन संपन्न और आराम तलब लोगों ने इन स्थानों को ऐशगाह बना दिया। हि...

सरकारें क्यों छिपाती हैं मौसम की जानकारी?

चित्र
उत्तराखंड में बादल फटा। तबाही जारी है। तीन साल पहले लद्दाख में बादल फटा। भयानक तबाही हुई। इससे पहले उत्तरकाशी में भूकम्प और बारिश से बर्बादी हो चुकी है। सवाल उठता है कि मौसम विभाग को अंदाजा नहीं था कि भारी बरसात सिर पर है? प्रदेश और जिला प्रशासन को भी भनक नहीं थी? उत्तराखंड का आपदा प्रबंधन विभाग सो रहा था? या फिर वो आपदा आने के बाद ही काम शुरू करने के लिए बना है? भारत का आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, केंद्रीय जल आयोग, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय - ये सब एजेंसियां क्या कर रही थीं?  वन विभाग की मंजूरी के बिना नदी किनारे निर्माण मना है। फिर कैसे पहाड़ी क्षेत्रों में अनाधिकारिक निर्माण होते रहते हैं? वो भी नदियों के तट पर। खुद प्रदेश सरकार कह रही है कि बाढ़ से गिरे ज्यादातर मकान गैरकानूनी थे, इसलिए वे  मुआवजे के हकदार नहीं हैं। भई वाह। मकान गिरते ही पता चल गया कि गैरकानूनी है। ठीक-ठाक खड़ा था तब किसी को भनक नहीं थी। जाहिर है सबकी मिली भगत है। भ्रष्टाचार के चलते ही ये गड़बडिय़ां हैं। मेरे एक पत्रकार मित्र ने हाल ही में फेसबुक पर राज जाहिर किया कि सरकारें मौसम की सूचनाएं छिपाती...