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कविता : लॉकडाउन के पहाड़

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  चलो कहीं फिर दूर चलें,  रेतीले सागर के ऊपर, पथरीले मंजर पर ढूंढें,  कुछ सपने , शांति सरीखे हम। उन पर्वत शिखरों से मिलने,  फिर भाग चलें , फिर दौड़ चलें, उन अनदेखे विस्तारों से,  फिर आंख - मिचौली कर लें हम। उस सतरंगी से पानी की,  वो झील बुलाती है अक्सर उत्तुंग हिमालय की चोटी,  से नाता जोड़ें चलके हम। अब मत रोको , रोकोना तुम,  हमको कोरोना रोको ना को को रो रो, कोरोना तु्म,  जाने दो , नहीं रुकेंगे हम। - नरविजय यादव

सारा खेल ही भोंपू का है

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नशे की हालत में गाड़ी मत चलाओ। होश के बिना ट्वीट मत करो। सुबह-सुबह चार ट्वीट क्या कर दिये कि सिर मुंडाना पड़ गया सोनू निगम को। अपने ही घर में। अपने ही नाई आलिम हकीम से। वो भी मीडिया के सामने। कलकत्ता के एक मौलवी की दिली चाहत थी। लेकिन फतवा देकर मुकर गया पट्ठा। उसे टीवी पर आना था। काम हुआ और खिसक लिया। यही तो कमजोरी है टीवी की। कोई भी लटक लेता है चलती गाड़ी में।  तब सोनू के लंबे बाल होते थे। कुछ साल पहले। उनके  एक गीत का वीडियो शूट होना था। लद्दाख की नुबरा वैली में। इच्छापूर्ति गायित्री मंत्र के लिए। वीकॉन म्यूजिक की मनीषा डे ने फोन किया। लद्दाखी बच्चे चाहिए थे। मेरे अनुरोध पर महाबोधि स्कूल की बच्चियों को भेजा गया। लोबजांग विसुद्दा लेकर गये एक बस में। लेह में ट्रेवल प्लानर और नेचर फोटोग्राफर हैं। अच्छे से शूटिंग हुई। मैंने चंडीगढ़ से ही फोन पर सारा जुगाड़ किया था। सोनू को भी एसएमएस भेज कर गाइड किया। किधर जाना है, किधर मुडऩा है। इस तरह वे भिक्खू संघसेना से मिल पाये।  कुछ लोग तडक़े चार बजे ढोलकी-मंजीरे लेकर निकलते हैं चंडीगढ़ में। बड़ा सुकून मिलता है मॉर्निंग कीर्...

गाटा लूप का बोतल वाला भूत

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लद्दाख के निर्जन पहाड़। मीलों तक आदमी नहीं। चिड़िया नहीं। जानवर नहीं। बस, आप और सड़क। कहीं-कहीं तो सड़क भी नहीं। सिर्फ ऊबड़-खाबड़ रास्ता। हिमालय का ठंडा रेगिस्तान। जीवन कठिन है इस भूभाग में। दिन तो खूबसूरत नजारे देखते बीत जाता है। लेकिन रात का क्या ? तब तो डर लगता है। भूत भी दिख सकता है। बशर्ते मन कमजोर हो। ऐसा ही एक स्थान है गाटा लूप। बीस तीखे मोड़ों वाली ऊंची चढ़ाई। मनाली से लेह के रास्ते में। नकीला पास से पहले। प्लास्टिक की सैकड़ों बोतलों का ढेर। बिस्किट के इक्का-दुक्का पैकेट भी। लाल झंडियों वाली एक गुफा जैसा कुछ। यह बोतल वाले भूत का बसेरा है। या कह लीजिए एक मंदिर। स्थानीय लोगों ने इसे मंदिर जैसा स्वरूप दिया है। हमने ड्राइवर से पूछा बोतलों का राज। पानी की बोतलें। इतनी सारी। आखिर क्यों? जवाब मिला, यहां एक प्यासा भूत रहता है। रात को गुजरते ट्रक ड्राइवरों को परेशान करता है। इस चक्कर में अनेक हादसे हो चुके हैं। भूत को खुश रखने के लिए ट्रक ड्राइवर यहां मिनरल वाटर की बोतलें रख देते हैं। कभी कभार बिस्किट भी। फिर, वे गुजर जाते हैं यहां से। सुरक्षित। किस्सा कुछ यूं है। कुछ साल पूर...

गोबर के कन्हैया, अन्नकूट के पहाड़

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गोवर्धन पूजा। अन्नकूट। आज है। कन्हैया ने गोवर्धन पर्वत उठाया। छोटी उंगली पर। भारी बारिश से प्रजा की रक्षा हेतु। भागवत पुराण में वर्णन है। वल्लभ सम्प्रदाय के लिए पूजा का खास दिन।  Lord Krishna raising the Govardhan Parvat on his finger. (Source: Unknown) अन्नकूट यानी प्रभु को भोजन के पहाड़ समर्पित करना। धन्यवाद करने की एक विधि। आपने हमें भोजन दिया, उसके लिए धन्यवाद। स्वामीनारायण सम्प्रदाय के लिए महत्वपूर्ण दिन। गौड़ीय सम्प्रदाय के लिए भी।  हम भी बनाते थे गोबर से भगवान के विविध रूप। आंगन में सजाते थे। गांवों में अब भी होता है ऐसा। बाजार की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं। होगी भी क्यों। गोबर कितने में बिकेगा। शॉपिंग माल में तो हर्गिज नहीं। फिर क्यों मनायें। इसीलिए शहरी लोग कम ही जानते हैं इसे।  मुझे याद है। मां गोबर से घर लीपती थीं। गांव के घर का कच्चा फर्श। पीली मिट्टी मिलाते थे गोबर में। फर्श पर निखार आ जाता था। पीला मिट्टी लेने मैं भी जाता था बड़ों के साथ। बैलगाड़ी में बैठकर। अच्छे दिन थे वे। सरल जीवन। परम्पराओं का निर्वाह। आपसी मेलजोल। भाईचारा। याद है सब। परम्...

साइकिल पर हिमालय

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सैकड़ों किलोमीटर पैडल मारते हुए दुनिया की सबसे ऊंची सड़क पर पहुंचना किसी भी साइकिल सवार का सपना हो सकता है। इस सपने को हकीकत में बदला मनाली-खारदूंगला साइकिलिंग चैम्पियनशिप 2015 में भाग ले रहे 63 साइकिल सवारों ने। इनकी यात्रा शुरू हुई जुलाई के अंतिम सप्ताह में मनाली के जवाहर चौक से, जिसका समापन हुआ खारदूंगला पर, जिसे दुनिया का सबसे ऊंचा मोटरेबल दर्रा होने का गौरव प्राप्त है। चैम्पियनशिप के आयोजक नॉर्दर्न एस्केप्स के संस्थापक गौरव शिमर के लिए यह एक बेहद संतोषजनक क्षण था। छोटी-मोटी परेशानियों को छोड़कर अन्य कोई बड़ी दुर्घटना पेश नहीं आयी। हालांकि, रेस समाप्त होने के अगले ही दिन लेह में भारी बारिश के चलते मनाली और श्रीनगर राजमार्ग जरूर बंद हो गये। इस कारण से चंडीगढ़ और दिल्ली की ओर वापसी की यात्रा प्रभावित हुई। आर्मी ने तो तीन दिनों के लिए लद्दाख में बादल फटने जैसी घटनाओं की आशंका के चलते चेतावनी भी जारी कर दी थी। हालांकि, ऐसी कोई अनहोनी हुई नहीं। सिवाय इसके कि एक दिन के लिए लेह आने-जाने वाली सभी उड़ानें बंद रहीं। पुरुष वर्ग में चैम्पियनशिप जीतने में कामयाब रहे पी. बी. प्रधान, जब...

चाय की चर्चा

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मिलने-जुलने और बात करने के तरीके लगातार बदल रहे हैं। राम-राम जी, नमस्ते, प्रणाम से गुड मॉर्निंग और हाय-हैलो तक आ गये। खिचड़ी, समोसा, पूड़ी-परांठा से चलते हुए पिज्जा व नूडल खाने लगे। पर एक चीज ऐसी है, जिसने बचपन से आज तक हमारा साथ नहीं छोड़ा। जी, वो है चाय। न इसके बनाने का तरीका बदला, न पीने-पिलाने का।  हमारे घर में चाय को एक उत्सव की तरह लिया जाता था। तुलसी के पत्ते और चुटकी भर नमक मिली चाय का समय नियत था। सुबह की चाय सात बजे और शाम को ठीक चार बजे। घड़ी देखे बिना हम बता सकते थे कि चाय का टाइम हो गया या नहीं। स्कूल के दिनों में कैरोसिन के स्टोव पर बनते अजवाइन के परांठे और फिर तुलसी-अदरख वाली चाय। आज भी याद है अजवाइन का वो स्वाद और चाय की चुस्कियां। स्कूल बस छूट न जाये, इसलिए मम्मी गरम चाय को प्लेट में डालकर ठंडा कर देती थीं।  इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के दिनों में पुराना कटरा की चाय बड़ी खास होती थी। बड़े-बड़े भगौनों में खौलती चाय में वे कोई खास मसाला डालते थे। इसे पीने के लिए छात्रावासों के लड़के देर रात तक कुरता-पाजामा पहने इंतजार करते दिख जाते थे। बैंच के दोनों ओर पैर करक...

दिन और वर्ष नहीं, पल महत्वपूर्ण होते हैं

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आधी सदी का गवाह हो गया हूं आज मैं। संभवत: हम 1964 या कहें कि 60 के दशक में जन्मे लोग किस्मत वाले हैं। हमने अविकसित भारत देखा। विकसित होता भारत देखा। और अब तकनीकी प्रगति से वाकिफ होते हुए गतिशील भारत हमारे सामने है। आने वाले कल को संवारने के कई मौके हमारे हाथों में हैं। हमने ऐसे बहुत सारे पल देखे, जिन्हें आज के टीनएजर बच्चे समझ ही नहीं पाएंगे।  महाबोधि लद्दाख वाले गुरुजी भिक्खू संघसेना जी ने अपने एक ध्यान शिविर में बताया था कि जीवन को वर्षों में मापना उचित नहीं है। व्यक्ति की असली आयु तो उन पलों को जोड़ कर बनती है जो उसने मानव सेवा, प्राणी सेवा, प्रकृति सेवा और उपयोगी कार्यों में लगाये। जिंदगी का अधिकांश समय तो सोने, नित्य कर्म करने, भोजन और यात्रा करने में व्यतीत हो जाता है। इस व्यर्थ हुए समय को आयु में कैसे जोड़ सकते हैं आप। इस लिहाज से मेरी आयु शायद उन्नीस-बीस वर्ष ही बैठेगी। आप भी अपने उपयोगी पलों की गणना करके देखिए। Sindhu Darshan, a few kilometers away from Leh in Ladakh (Jammu & Kashmir) कुछ ही पलों पूर्व लखनऊ एयरपोर्ट से श्रद्धेय माधवकांत मिश्र जी (महामंड...

लद्दाख : ठंडे रेगिस्तान में सडक़ का सफर

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लद्दाख यानी जन्नत। एक ख्वाब। छोटा तिब्बत। दुनिया की छत। जम्मू-कश्मीर का बड़ा हिस्सा। बौद्ध धर्म का महत्वपूर्ण ठिकाना। पाकिस्तान व चीन का निशाना। आम हिंदुस्तानी जिसके बारे में ठीक से नहीं जानते। जहां सडक़ें सात माह तक बर्फ जमी होने के कारण बंद रहती हैं। जहां हिमालय की बर्फीली चोटियां एकदम पास होती हैं। सडक़ के दोनों ओर जहां सिर्फ बर्फ की दीवारें होती हैं। बरसात में जहां बारिश नहीं होती। जहां पहाड़ों पर घास का एक तिनका तक नहीं दिखता। जिसे लोग ठंडा रेगिस्तान कहते हैं। जहां चाय याक के दूध या फिर डिब्बाबंद दूध से बनती है। आकाश जहां नीला दिखता है। ऑक्सीजन जहां विरल होती है। जहां पर्यटक तेज चलते ही हांफने लगते हैं। वो लद्दाख। खबर है कि श्रीनगर-लेह राजमार्ग फिर बंद हो गया है। भूस्खलन की वजह से यातायात ठप है। कुछ दिन लग जाएंगे रास्ता साफ करते। काफी संख्या में लोग श्रीनगर से कारगिल होते हुए लेह पहुंचते हैं। सडक़ मार्ग से लेह जाने का यह एक सुगम रास्ता है। तीन दिन लग जाते हैं। वहां रात में सडक़ यात्रा की अनुमति नहीं होती। रात में विश्राम करना पड़ता है। परंतु यह यात्रा होती बेहद रोमांचक ह...

भिक्खु संघसेना के गाँव में एक दिन

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गुरूजी भिक्खु संघसेना का गाँव लेह सिटी से करीब पिच्चासी किलोमीटर दूर है. तिन्गमोस्गंग नामक इस गाँव में महाबोधि का एक खूबसूरत स्कूल है जहां ग्रामीण बच्चे तीन बसों से आते हैं. हमारे साथ फिल्म एक्टर हेमंत पाण्डेय और डाइरेक्टर हरीश शर्मा के अलावा चंडीगढ़ के कर्नल विजय जामवाल और दिल्ली से पूर्व डीआईजी  रोमिंदर प्रताप सिंह भी थे. गुरूजी ने हमें स्कूल के स्टाफ और छात्रों से मिलवाया. वहीँ हरीश जी की निगाह इस प्यारी सी बच्ची पर गयी तो उन्होंने घोषणा कर दी कि वे इसे अपनी अगली फिल्म में एक्टिंग के लिए लेंगे. स्कूल जाकर अच्छा लगा.

मिस ईरान के साथ एक दिन

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मिस ईरान मलिका अमीना एक इवेंट के सिलसिले में चंडीगढ़ आई थीं। हमने उस इवेंट का पीआर किया। तभी उनसे बातचीत हुई। मैंने उन्हें महाबोधि गर्ल्स होस्टल के बारे में बताया तो उन्होंने वहाँ जाने की इच्छा जताई। उन्होंने लद्दाख के बारे में और लेह स्थित महाबोधि इन्टरनेशल मेडिटेशन सेंटर के विशाल कैम्पस के बारे में कई सवाल पूछे। लद्दाखी स्टुडेंट्स से मिलने के बाद मलिका ने अगले साल लद्दाख जाने और वहां डांस वर्कशॉप आयोजित करने का वादा किया। मलिका एक बेहतरीन इंसान और कुशल डांसर हैं। दुबई में उनका अपना डांस स्कूल है। महाबोधि गर्ल्स होस्टल में प्रार्थना और बातचीत के बाद उन्होंने कुछ देर स्टुडेंट्स के साथ जमकर डांस किया और खूब मस्ती की। मिस ईरान अक्सर फेसबुक पर मुझसे इन गर्ल्स की खैरियत के बारे में पूछती रहती हैं।

लेह की बात ही कुछ और है

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लेह लदाख के बारे में पहले मैं अधिक नहीं जानता था. गत वर्ष नवम्बर में एक पत्रकार मित्र, वंदना शुक्ला, के आग्रह पर मैं एक बौद्ध भिक्षुक भिक्षु संघसेना से चंडीगढ़ के होटल पिकाडिली में मिला. वे महाबोधि इंटर्नेशनल मेडिटेशन सेंटर, लेह-लदाख के संस्थापक निदेशक हैं.  यह संस्थान लदाख क़ी गरीब व अनाथ लड़कियों को शिक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. लेह स्थित महाबोधि स्कूल से दसवीं करने के बाद इन बच्चों को आगे पढने में प्रोब्लम थी. सो गुरूजी ने चंडीगढ़ में एक गर्ल्स होस्टल खोल दिया. तीस से अधिक लड़कियां रामगढ़ स्थित इस हॉस्टल में रह कर चंडीगढ़ पंचकुला के कॉलेजों में स्टडी कर रही हैं. इस वर्ष इनकी संख्या पचास से अधिक हो जाएगी. गत अप्रेल में मुझे लेह जाने का अवसर मिला. ब्रिटिश सिंगर मिली मूनस्टोन एवं उनके वकील दोस्त अर्जेंटीना निवासी अलेजांद्रो ग्रिसोसकी भी साथ थे. सड़क मार्ग पर बर्फ जमा थी, इसलिए हम दिल्ली से गोएयर क़ी फ्लाईट से लेह पहुंचे. वहां बर्फ से लदे ऊँचे पहाड़ देखकर मजा आ गया. अदभुत नज़ारा था. ऊँचे पहाड़ पर चढ़ कर हमने फोटोग्राफी क़ी और ...