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सोशल मीडिया पर रुतबा कायम रखना आसान नहीं

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  देश ही क्या, दुनिया भर के बच्चे, युवा और वयस्क सोशल मीडिया की गिरफ्त में हैं। इस जाल में जो एक बार फंस गया वो निकल नहीं पाता, उल्टे उलझता ही चला जाता है। सोशल मीडिया को बनाया ही इस तरह से गया है कि इनकी लत पड़ जाती है। यही कारण है कि सोशल मीडिया कंपनियों के मालिक अपने बच्चों को अपनी ही सोशल साइट्स से दूर रखते हैं। उन्हें पता है कि यह अफीम की गोली है, एक बार लत लग गई तो छूटने वाली नहीं। सोशल साइट्स पर फॉलोअर्स, फ्रेंड्स, लाइक, कमेंट का ऐसा खेल चलता है कि हर कोई चक्कर खाता है।  पिछले दिनों ट्विटर पर अपने फॉलोअर घटने की शिकायत को लेकर देश की एक ऐतिहासिक राजनीतिक पार्टी के सुपुत्र ने कंपनी के मैनेजमेंट को चिट्‌ठी लिख मारी कि सरकारी दबाव में उसके फॉलोवर घटाए जा रहे हैं। कंपनी ने सफाई में कह दिया कि संदिग्ध हरकतों को रोकने के लिए उनके सिस्टम में स्वचालित फिल्टर लगे हैं, जो अपने आप एक्शन लेते हैं, राजनीति से इसका कोई लेना देना नहीं। इससे पहले, एक बड़े अभिनेता ने ट्वीट किया था कि रातोंरात उनके लाखों फॉलोवर भाग गए। तब उन्हें बताया गया कि फेक अकाउंट और आटोमैटिक अकाउंट यानी बॉटस को हट...

चार महीने हो गये। बाहर की दुनिया से कटे हुए। आज तो शहर में गेड़ी ही लगा डाली।

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चार महीने हो गये। बाहर की दुनिया से कटे हुए। शुरू का एक माह तो ऐसा रहा कि दिन और रात का ही पता नहीं चलता था। दूसरे महीने खिड़की से तनिक धूप दिखी और बिल्डिंग का एक रूखा सा हिस्सा। उसे ही देर तक निहारता रहा था। चलना तो छोड़िए, बैठना ही एक सपना था। ग्यारह बार मूवमेंट हुआ, लेकिन स्ट्रेचर पर लेटे-लेटे। घर आने के बाद भी बैड से हिलना मुश्किल था। पिछले कुछ हफ्तों में हालात सुधरे। आज तो शहर में गेड़ी ही लगा डाली। माउंट व्यू के सामने काॅफी पी। लेक देखी। सड़कों से गुजरते हुए ऐसा लगा मानो वृक्षों और हरियाली के बीच तैरते हुए जा रहे हों। यही तो विशेषता है चंडीगढ़ की। वैक्सीन लगवाने के बाद खुशबू ने कहा, "डैडी मौसम तो गेड़ी का हो रहा है, चलें?" मेरे मौन को ही मेरी स्वीकृति मान बेटी ने कार सुखना की ओर घुमा दी। लगा ही नहीं कि कई माह के बाद घूम रहा हूं। शरीर स्वस्थ हो रहा है। मन तो वैसे भी हमेशा उल्लास से भरा रहता है। ईश्वर से प्रार्थना है कि सबका जीवन हंसी-खुशी से भरा रहे! भारत खुशहाल रहे! जीव-जंतु स्वच्छंद घूमें, जिएं! अफगानिस्तान में हालात सुधरें, अमन कायम हो! - नरविजय यादव

डैडी, ये वायरस दिमाग पर असर डालता है। यह एक माइंड गेम है और इसमें आपको जीतना है।

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कोविड ने मेरे फेफड़े 98 प्रतिशत तक डेमेज कर दिये थे, जिसका मेडिकल कॉलेज, चंडीगढ़-32 के मेन आईसीयू में लंबा इलाज चला, तीन महीने तक ऑक्सीजन लगी रही, तब जान बच पायी। पूरे समय सबको यही चिंता रहती थी कि ऑक्सीजन का लेवल ठीक है या नहीं। पूरा इलाज बेटी खुशबू की देखरेख में हुआ। मुझे खुश देखने और मेरा ऑक्सीजन लेवल बढ़ाने के लिए जब भी मौका मिलता, बेटी मेरे मोबाइल पर शकीरा या बोनी-एम के वीडियो प्ले कर देती थी। दोनों ही मेरे फेवरिट हैं, लेकिन शकीरा का जबर्दस्त फैन हूं।  जब मैं कोरोना से संघर्ष कर रहा था, तब खुशबू ने मुझे बार-बार चेताया था कि 'डैडी, ये वायरस दिमाग पर असर डालता है, खौफ पैदा करता है। यह एक माइंड गेम है और इसमें आपको जीतना है।' मैं ईश्वर पर भरोसा रखे रहा। इंजेक्शन लगते तब भी भगवान शिव का स्मरण करता, जिससे मुझमें अपार ऊर्जा आ जाती थी। बाॅलीवुड सिंगर  Mika Singh  के भेजे वाॅयस नोट्स भी अक्सर सुनता था, जिसमें उन्होंने कहा था: "आप हमारे बब्बर शेर हो और जल्दी ठीक होकर वापस आओगे।"  इलाज के दौरान मैं अच्छा संगीत बराबर सुनता रहा। सकारात्मक सोच, ईश्वर पर भरोसा, डाॅक्टरों की प्...

कैलाश खेर को पसंद है जीरा-आलू की सब्जी और अरहर की दाल

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कैलाश खेर बॉलीवुड के ही नहीं, आध्यात्मिक एवं सूफी गायन के क्षेत्र में भी भारत के सर्वोच्च सितारों में से एक हैं। अपनी बुलंद और दिलकश आवाज़ से वह वातावरण में एक उच्च स्तर की ऊर्जा उत्पन्न करने में सक्षम हैं। उनकी आवाज़ बाकी सब गायकों से एकदम अलग है। वह भगवान शिव के परम भक्त हैं। मंच पर प्रस्तुति देते समय वह अक्सर एक डमरू साथ रखते हैं, जो भगवान शिव को प्रिय है।  उनके बैंड का नाम कैलासा है और कैलाश पर्वत पर शंकर जी का वास है, यह सर्वविदित है। कैलाश जी एक आध्यात्मिक कलाकार हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी पसंद करते हैं। देश-विदेश के अनेक उत्सवों में कैलाश खेर और प्रधानमंत्री मोदी को प्राय: एक ही मंच पर साथ देखा गया है। ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु जग्गी वासुदेव का महाशिवरात्रि उत्सव हो अथवा ऋषिकेश में परमार्थ निकेतन का अंतर्राष्ट्रीय योग महोत्सव, शिव का आह्वान कैलाश जी की मधुर आवाज़ से ही होता है। मेरा सौभाग्य है कि मुझे कैलाश खेर जी का सान्निध्य और स्नेह प्राप्त है। दैनिक भास्कर में मेरे पूर्व सहकर्मी अजय गर्ग मुंबई में पत्रकारित...

नरविजय यादव नैस्कॉम कम्युनिटी के एडवाइजरी बोर्ड में शामिल

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नैसकॉम कम्युनिटी, भारतीय प्रौद्योगिकी उद्योग के लिए ज्ञान साझा करने वाला एक खुला मंच, ने आज अपने सलाहकार मंडल के सदस्यों के नामों की घोषणा कर दी। कम्युनिटी की आधिकारिक वेबसाइट पर इसका विवरण दिया गया है। नैस्कॉम भारत में 180 अरब डॉलर के आईटी एवं बीपीएम उद्योग का एक शीर्ष निकाय है।  छह-सदस्यीय सलाहकार बोर्ड में नैस्कॉम के रिसर्च हेड, अच्युता घोष के अलावा डॉ. अमित नागपाल, डॉ. डी प्रशांत नायर, कृति मखीजा, नरविजय यादव और रिमझिम रे शामिल हैं। ब्लॉगर्स एलायंस के चंडीगढ़ चैप्टर के प्रेसीडेंट नरविजय यादव को समाचार उद्योग में 30 से अधिक वर्षों का अनुभव है।     अच्युता घोष ने कहा, 'नैस्कॉम कम्युनिटी में नवीनतम तकनीकों और नीतियों व बदलते बाजारों से उनपर होने वाले प्रभाव की समीक्षा करते हैं। इसके अलावा, हम मौजूदा और भविष्य के ट्रेंड पर नजर रखते हैं, उद्योग के लीडर्स से बात करते हैं और उम्मीद जगाने वाले स्टार्टअप व नये विचारों पर चर्चा करते हैं।' अच्युता को एनालिटिक्स और अनुसंधान के क्षेत्र में 18 साल से अधिक का पेशेवर अनुभव है।  डॉ. अमित नागपाल, ब्लॉग...

दही-जलेबी की तरह गायब है भाई-बहन का रिश्ता !

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  इंदौर जाऊं और दही-जलेबी-पोहा न खाऊं, ऐसा कैसे हो सकता है? रक्षाबंधन आ गया। सगे भाइयों के राखियां बंधेंगी। मुंहबोले भाइयों का जमाना तो गया। अब न कोई बनना चाहता है, न बनाना। कम से कम टीवी देख कर तो यही लगता है। रियेलिटी प्रोग्राम हों या कपिल शर्मा जैसे शो, सब यही दिखाते हैं कि किसी लड़की को बहन कहना बेकार बात होती है। यहां तक कि, लड़िकयां भी नहीं चाहतीं किसी को भाई बनाना। यह नये जमाने का शगल है कि भाई-बहन का मुंहबोला रिश्ता दही-जलेबी के नाश्ते की तरह दुर्लभ हो गया है। एक वजह यह भी है कि आज के लड़कों में दम नहीं होता है भाई बनने का। फुस्स टाइप के पटाखे क्या खाके बनेंगे किसी लड़की के भाई? उसके लिए दमखम चाहिए होता है। बहन मुश्किल में हो तो रक्षा करने के लिए। करेक्टर चाहिए होता है। संस्कार चाहिए होते हैं। आत्म-अनुशासन चाहिए होता है। मर्दानगी चाहिए होती है महिलाओं का सम्मान करने के लिए। यह सब होता नहीं, तो पिचकू लड़के ब्वॉय फ्रेंड बनके ही खुश हो लेते हैं। लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार घटिया और ओछे किस्म के लोग करते हैं। यह चरित्रहीनता की पराकाष्ठा है। चंडीगढ़ के प्रतिष्ठित चित्...

खुश रहने के कितने पैसे लगते हैं?

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वर्तमान में जिएं  और   प्रसन्न रहें  : भिक्खू संघसेना एक पत्रकार मित्र की फेसबुक पोस्ट देखी तो मैं सोच में पड़ गया। उनकी पत्नी ने लिखा था - ' एक अच्छी फैमिली फोटो , क्योंकि हम अक्सर एक साथ समय नहीं बिता पाते हैं और एक शादी के मौके पर हम आज इतने खुश हैं , जितना पहले कभी नहीं थे … बंगाली शादियां होती ही ऐसी हैं , वे आपको बेहद खुश कर देती हैं। ' मित्र पत्रकार हैं , तो जाहिर है कि परिवार को कम ही समय दे पाते होंगे। पत्रकारों का जीवन होता ही ऐसा है। दुनिया भर की खुशियों और गम में शरीक होते हैं , पार्टियों में जाते हैं , देश - विदेश भी घूम आते हैं , लेकिन अकेले ही। न तो इतनी छुट् ‌ टी मिल पाती है , न इतने पैसे होते हैं कि मनचाहे ढंग से परिवार के साथ घूम - फिर सकें। कहीं दूर चले भी गये तो वापस लौटने पर कुर्सी मिलेगी या छिन जायेगी , इसकी धुकधुकी अलग से लगी रहती है। शाम दफ्तर में बीतती है और पूरा शहर जब सो जाता है , तब घर...

पहाड़ से भी मुश्किल होता है पहाड़ा

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उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में मेरे गांव 'पलई' की हमारी एक यात्रा पंद्रम- पंद्रा , दूनी तीस, तिंयां पैंतुल्लाह, चौका साठ, पना पिचत्तर, छक्का नब्बे, सत्ते पांच, अट्ठे बीस, नेमा पैंतीस, धांईं पचास ! आज की गूगल जैनेरेशन क्या जाने पहाड़ा क्या होता है। स्कूलों में इसे अब टेबल कहा जाता है। लेकिन बच्चों को आज के तथाकथित 'मॉडर्न एवं महान' स्कूल हिंदी में गिनती नहीं सिखाते  हैं । फिर सब्जी खरीदते समय या टीवी पर समाचारों में छप्पन, तिरानवे या तिहत्तर जैसी संख्याएं सुनकर नये बच्चों का सिर चकराता है कि यह कौन से ग्रह की भाषा बोली जा रही है। भारत में बड़े हो रहे आज के किशोरों और युवाओं की यह एक बड़ी कमजोरी है। बड़ी तकलीफ झेलनी पड़ती थी हमें पहाड़ा याद करने में। चार दशक पहले पहाड़ा याद करना जरूरी होता था। इसके बिना तो गुजारा ही नहीं था। गणित के सवाल हल करने के लिए पहाड़ा याद होना आवश्यक था। शायद चौथी-पांचवी कक्षा से ही पीछे पड़ गया था पहाड़ा। पहाड़ से भी मुश्किल होता था पहाड़ा। पिताजी अध्यापक थे। पहाड़े के मामले में तो वे किसी कर्नल जैसा रुख अपनाते थे। बिजली चली जाती थी तो कुछ ...

चिड़ियाघरों में जीव-जंतुओं संबंधी किताबें भी मिलनी चाहिए

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दलाई लामा की निगाह में करुणा यानी कम्पैशन सबसे महत्वपूर्ण मानवीय गुण है। पशु-पक्षियों के मामले में तो यह और भी सटीक है। वे बोल कर अपनी परेशानी हमें नहीं बता सकते। मूक जीवों के प्रति दया और करुणा का भाव रहे, इसके लिए जागरूकता जरूरी है। चिड़ियाघर इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। देश भर में करीब डेढ़ सौ चिड़ियाघर एवं प्राणी उद्यान हैं। खुली हवा, घना जंगल उत्तरी भारत का एक बड़ा चिड़ियाघर चंडीगढ़ से 20 किलोमीटर की दूरी पर छतबीड़ में है। यह पंजाब सरकार के अधीन है और जीरकपुर के नजदीक स्थित है। वर्ष 1970 में इसका निर्माण शुरू हुआ और 13 अप्रैल 1977 को तत्कालीन राज्यपाल, महेंद्र मोहन चौधरी ने इसका उद्घाटन किया। उन्हीं के सम्मान में इसे महेंद्र चौधरी जूलॉजिकल पार्क नाम दिया गया। शुरू में कुछ जानवरों को असम के गुवाहाटी जू से लाया गया था। यह कई हेक्टेयर क्षेत्र में फैला एक सुव्यवस्थित चिड़ियाघर है, जहां 100 से अधिक किस्म के वृक्ष हैं और सैकड़ों प्रजातियों के 1300 से अधिक जीव-जंतु यहां रहते हैं। पैदल घूमने का आनंद पार्क में बैटरी चालित वाहनों पर बैठकर यहां से वहां जा सकते हैं...

चलो साथ चलते हैं

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सतारा* खिसक लिया अठारह आ गया धीमा था वो साल मंथर गति धीमी प्रगति आर्थिक मोर्चे पर विफल प्रदूषण में अव्वल जीएसटी का जाल बाजार बेहाल प्याज-टमाटर लाल रेल हादसे बाबाओं के जंजाल। दस साल बीत गये दुनिया की मंदी को सुना है अब कुछ होगा वक्त बदलेगा डॉलर दौड़ेगा रुपया भी चलेगा। एक जनवरी शुरू है दिन सोमवार है दस बज गये कोहरा बरकरार है ऐसा ही चलेगा खास नहीं बदलेगा बादशाह जो भी बोले देश को बुखार है। चलो साथ चलते हैं एक-एक कदम बढ़ते हैं उम्मीद पर दुनिया कायम है यही सोचकर गहरी सांस लेकर फिर हिम्मत करते हैं नये साल को नये जज्बे से दिल से सलाम करते हैं। (* पंजाब में सत्रह को सतारा बोलते हैं) Email: narvijayindia@gmail.com 

क्या लिखूं आज? जाम लगा है।

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इतना कुछ हो रहा है। कुछ भी नहीं हो रहा। समय बदल रहा है। सब रुका पड़ा है। चुटकी बजाते चीजें हाजिर हैं। नहीं मिलतीं, यही तो दिक्कत है। पैसा बहुत है इस देश में। बस पैसा ही तो नहीं है। जो चाहो वो खा लो। जहर मिला है हर चीज में। दूध, सब्जी, फल खाने चाहिए। क्यों, जहरीले हैं इसलिए?  गरमी रिकॉर्ड तोड़ रही है। तो क्या, कोक पेप्सी है न। पियो, फिर डाइबिटीज झेलो। कैंसर भी तो चलन में है।  बाजार पटे हैं कैंसर की चीजों से। हर चीज में कैमिकल। हर चीज से कैंसर। अखबार यही बताते हैं। उधर इनके विज्ञापन भी छापते हैं। तभी तो अखबारों पर संकट है। सोशल मीडिया सब खा गया। सबके हिस्से की खबर। सबके हिस्से का ज्ञान। सब ज्ञानी हैं। डाइबिटीज और मोटापे से परेशान भी। देखा-देखी में करते हैं शॉपिंग। शान बघारने को। नकली खाना। नकली जिंदगी। असली रोग। असली झगड़े।  क्यों नहीं होते शांत? कश्मीर से पूछते हो? भई, सीएम हो तो महबूबा मुफ्ती जैसी। कोई काम ही नहीं। हर काम पत्थरबाज करते हैं। पैसे मिलते हैं न। घर चलता है। सरकार कौन सा जॉब दे रही है? कामधंधे की जगह सेना लगा दी। अबदुल्ला के पास सॉल्युशन है। खाक सॉ...

लिखो, लिखो, कुछ तो लिखो !

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ब्लॉग लिखने का बहुत बार मन किया। पर हर बार सवाल एक ही रहता कि क्या लिखूं? विषय मिल जाये, तो अगला सवाल कि कहां से शुरू करूं? फिर, किस भाषा में लिखूं? दिल की भाषा हिंदी है, लेकिन रौब तो अंग्रेजी का है। या कि हम अंग्रेजी जानते हैं तो हिंदी में क्यों लिखें? इस कशमकश में न जाने कितने प्रतिभाशाली लोग लेखक नहीं बन पाये। या उनके मन की बातें मन ही में रह गयीं। वे दुनिया से चले गये और अपने पीछे अपना कोई अनुभव नहीं छोड़ गये।  "Hundreds of topics are all around us to write upon," I told my daughter.   ऐसी गलती मैं क्यों करूं? मैं तो जन्मजात पत्रकार हूं। लेखक होने का सपना रखता हूं। पेशे से भी एक लेखक ही हूं। लेकिन अखबार की नौकरी करते हुए लिखना और खुद की खुशी के लिए लिखना दोनों अलग बातें हैं। खुद के लिए या अपने ब्लॉग के लिए लिखना एक अनुशासन का काम है। कोई डंडा लेकर नहीं खड़ा है सिर पर। नौकरी में तो प्रेशर रहता है- बॉस का। कैरियर का। डेडलाइन का। और, लालच रहता है- सम्मान का। तनख्वाह का। रुतबे का। आज बेटी ने यही सवाल दाग दिया। ब्लॉग लिखना है। किस लाइन पर लिखूं? विषय क्या...

बेटी, मैं हर वक्त तुम्हारे साथ हूं

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कल एक फोन आया। करीब तीस साल बाद सुनी वो आवाज। तब वेे जिला सूचना अधिकारी हुआ करते थे मेरे शहर में। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे मैंने अपने एक मित्र के साथ मिलकर अपने स्कूल में एक प्रदर्शनी लगायी थी- "अखबार और तकनीक" विषय पर।  वे मुख्य अतिथि थे।  उनके हिसाब से देश में शायद अपनी तरह का पहला आयोजन था वो। सब कुछ रील की तरह घूम गया दिमाग में।  औपचारिक बातचीत के बाद उन्होंने बड़े ध्यान से बेटियों से जुड़ा एक अच्छा संदेश दिया। मन को छू गयी वो बात। बोले, हर पिता को अपनी बेटी से यह अवश्य कहना चाहिए कि-  "बेटी, मैं हर वक्त तुम्हारे साथ हूं। तुम्हारे हर सही-गलत निर्णय में तुम्हारे साथ हूं। तुम जो करना चाहोे। मैं हमेशा तुम्हारी ताकत बनकर रहूंगा। मैं इस घोंसले में तुम्हारी ताकत हूं ।  जब तुम दूर चली जाओगी, तुम्हारा नया घोंसला होगा, तब भी मैं तुम्हारी ताकत रहूंगा। बेटी मैं सदैव तुम्हारे साथ हूं और  हमेशा तुम्हारी ताकत  रहूंगा।" सच में, एक पिता के तौर पर बेटियों को यदि यह अहसास कराया जाये कि वे कभी भी अकेली नहीं हैं, तो उनका मनोबल बढ़ा रहेगा। वे अपने स...