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सामूहिक भोज का आनंद

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कई वर्षों पश्चात आज इस्कॉन मंदिर जाना हुआ। अच्छा लगा। खासकर पंगत में सबके साथ बैठकर प्रसादम ग्रहण करना। इसे भंडारा भी कह सकते हैं। खिले-खिले चावल, काले चने की सब्जी और हलवा। कागज की प्लेट सबके आगे रखी गयी। फिर बाल्टियों में भर कर लाया गया प्रसादम वितरित हुआ। पुरुषों को मंदिर के बेसमेंट में बिठाया गया और महिलाओं को बाहर टीन शेड के नीचे। कुछ वर्ष पहले सभी एक साथ इस शेड में ही बैठते थे। अब भक्तों की संख्या बढऩे से व्यवस्था में बदलाव लाजमी था। अब तो सायं आठ बजे से पहले भोजन के कूपन भी दिये जाने लगे हैं। कूपन देकर ही अंदर जाने की अनुमति मिलती है। मुझे यह नियम पता नहीं था और हम देर से भी पहुंचे थे। इसलिए पूछताछ करने पर मुझे ससम्मान पहली पंक्ति में बैठने दिया गया। कुछ ऐसा ही अनुभव बेटी का भी रहा। उन्हें भी बिना कूपन ही बैठने दिया गया। बेटी अपनी नानी के साथ वहां गयी थीं। इस्कॉन यानी इंटरनेशनल सोसायटी फॉर कृष्णा कांशसनेस नामक भक्ति आंदोलन की शुरुआत 1966 में स्वामी प्रभुपाद ने की थी। पहले न्यूयॉर्क और फिर दुनिया भर में घूम-घूम कर उन्होंने अकेले ही कृष्ण भक्ति का प्रचार किया। गीता औ...