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कौवे ही क्या, सभी पक्षियों को जीने का हक है

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ननिहाल के गांव में बीते थे बचपन के दिन। ढाक के पत्तों से जूते बनाते थे हम। पाकड़ के चौड़े पत्ते की फिरकी। और खेतों की जुताई के समय मामाजी के साथ पूरा दिन ट्रैक्टर की सवारी। मटर के खेत में मस्ती करते थे। मीठी हरी मटर छील कर खाते थे। उसके नीले, बैंगनी चटख फूलों के बिछौने पर लेट जाते थे।  शमशान वाले पेड़ पास में ही थे। कभी कभार वहां किसी की चिता भी रही होगी। मैंने देखा किसी को नहीं। पर, उधर जाते हुए डर सा लगता था। रात तो छोडि़ए, दिन में भी। घने वृक्षों पर मोरों का बसेरा था। ओह, क्या बोलते थे वो। केऊ केऊ की आवाजें रात में बहुत आती थीं। और, तीसरे पहर को पुड़ुकिया की आवाज। अब हम उसे पेंडुकी कहते हैं। मटमैले रंग की इस चिडिय़ा को कुछ लोग फाख्ता भी बोलते हैं। उसकी आवाज बड़ी निराशाजनक होती थी। सुस्ताई सी दोपहरी। ढलता सूरज। ऊपर से खीज पैदा करने वाली कुकुऊकू.. कुकुऊकू। मुझे पेंडुकी नहीं पसंद। तभी से। पिता जी सरकारी शिक्षक थे। उनका तबादला होता रहता था। दबंग किस्म के थे। हाथ में बेंत। चमड़े का बैग। छोटी तराशी हुई मूंछें। ऊपर को काढ़े हुए बाल। किसी रौबदार दारोगा जैसे दिखते थे। तभी तो देर...

फिर तो हिंदी की गंगा बहेगी

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हिंदी के लिए एक अच्छी खबर है। हमारे प्रधानमंत्री जी हिंदी में बोलते हैं। अब लगता है कि राष्ट्रपति भी हिंदी में भाषण दिया करेंगे। केंद्र सरकार के अनेक मंत्री हिंदी में बात करते हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जी की हिंदी तो लाजवाब है। एकदम संस्कृतनिष्ठ, शुद्ध हिंदी। सुन कर आनंद की अनुभूति होती है। वहां के पिछले दोनों मुख्यमंत्री हिंदी बोलते तो थे, लेकिन देहाती लहजे में। मायावती तो एक-दो लाइन भी बिना पढ़े नहीं बोल पाती हैं। मुलायम सिंह की हिंदी माशा अल्लाह। शब्द गोल-गोल होकर उनके मुंह में ही कुश्ती लड़ते रहते थे।   दरअसल, आधिकारिक भाषाओं पर संसद की समिति ने हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए 117 सिफारिशें की थीं। छह साल बाद, इनमें से कुछ अब अमल में आने की संभावना बनती दिख रही है। राष्ट्रपति ने कई सिफारिशों पर अपनी सहमति जता दी है। यदि यह निर्णय लागू हो गया तो सरकारी कामकाज में हिंदी का दबदबा बढ़ेगा। नेता और अधिकारियों के लिए हिंदी में लिखना-बोलना अनिवार्य हो जायेगा। होना भी चाहिए। हिंदी हमारी राजकीय भाषा है। देश का बड़ा तबका हिंदी में ही अपनी बात कहता-सुनता है। ...