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फिर तो हिंदी की गंगा बहेगी

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हिंदी के लिए एक अच्छी खबर है। हमारे प्रधानमंत्री जी हिंदी में बोलते हैं। अब लगता है कि राष्ट्रपति भी हिंदी में भाषण दिया करेंगे। केंद्र सरकार के अनेक मंत्री हिंदी में बात करते हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जी की हिंदी तो लाजवाब है। एकदम संस्कृतनिष्ठ, शुद्ध हिंदी। सुन कर आनंद की अनुभूति होती है। वहां के पिछले दोनों मुख्यमंत्री हिंदी बोलते तो थे, लेकिन देहाती लहजे में। मायावती तो एक-दो लाइन भी बिना पढ़े नहीं बोल पाती हैं। मुलायम सिंह की हिंदी माशा अल्लाह। शब्द गोल-गोल होकर उनके मुंह में ही कुश्ती लड़ते रहते थे।   दरअसल, आधिकारिक भाषाओं पर संसद की समिति ने हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए 117 सिफारिशें की थीं। छह साल बाद, इनमें से कुछ अब अमल में आने की संभावना बनती दिख रही है। राष्ट्रपति ने कई सिफारिशों पर अपनी सहमति जता दी है। यदि यह निर्णय लागू हो गया तो सरकारी कामकाज में हिंदी का दबदबा बढ़ेगा। नेता और अधिकारियों के लिए हिंदी में लिखना-बोलना अनिवार्य हो जायेगा। होना भी चाहिए। हिंदी हमारी राजकीय भाषा है। देश का बड़ा तबका हिंदी में ही अपनी बात कहता-सुनता है। ...

लद्दाख : ठंडे रेगिस्तान में सडक़ का सफर

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लद्दाख यानी जन्नत। एक ख्वाब। छोटा तिब्बत। दुनिया की छत। जम्मू-कश्मीर का बड़ा हिस्सा। बौद्ध धर्म का महत्वपूर्ण ठिकाना। पाकिस्तान व चीन का निशाना। आम हिंदुस्तानी जिसके बारे में ठीक से नहीं जानते। जहां सडक़ें सात माह तक बर्फ जमी होने के कारण बंद रहती हैं। जहां हिमालय की बर्फीली चोटियां एकदम पास होती हैं। सडक़ के दोनों ओर जहां सिर्फ बर्फ की दीवारें होती हैं। बरसात में जहां बारिश नहीं होती। जहां पहाड़ों पर घास का एक तिनका तक नहीं दिखता। जिसे लोग ठंडा रेगिस्तान कहते हैं। जहां चाय याक के दूध या फिर डिब्बाबंद दूध से बनती है। आकाश जहां नीला दिखता है। ऑक्सीजन जहां विरल होती है। जहां पर्यटक तेज चलते ही हांफने लगते हैं। वो लद्दाख। खबर है कि श्रीनगर-लेह राजमार्ग फिर बंद हो गया है। भूस्खलन की वजह से यातायात ठप है। कुछ दिन लग जाएंगे रास्ता साफ करते। काफी संख्या में लोग श्रीनगर से कारगिल होते हुए लेह पहुंचते हैं। सडक़ मार्ग से लेह जाने का यह एक सुगम रास्ता है। तीन दिन लग जाते हैं। वहां रात में सडक़ यात्रा की अनुमति नहीं होती। रात में विश्राम करना पड़ता है। परंतु यह यात्रा होती बेहद रोमांचक ह...

लद्दाख में पहली बार

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मैंने कभी सपने में भी न सोचा था कि लद्दाख से मेरा इतना पुख्ता नाता जुड़ जायेगा. पर ऐसा हुआ और अपने आप ही. लेह स्थित महाबोधि इंटर्नेशनल मेडिटेशन सेंटर के प्रचार प्रसार का जिम्मा क्या संभाला कि सब कुछ खुद व खुद होता चला गया. महाबोधि की सेवा मैंने सदैव ही निशुल्क की और नतीजा सामने है. अप्रैल में मेरी मुंहबोली बहन मिली मूनस्टोन केरल जाना चाहती थीं. मेरी सलाह पर वो लेह जाने को राजी हो गईं. मिली  ब्रिटिश सिंगर हैं. उनके मित्र अर्जेंटीना के अलेजांद्रो ग्रिसोसकी भी हमारे साथ लेह गए. महाबोधि लेह-लद्दाख में नरविजय यादव, नागासेना, मिली मूनस्टोन एवं अलेजांद्रो ग्रिसोसकी  दिल्ली एअरपोर्ट पर ही हमें महाबोधि लेह के वरिष्ठ सहयोगी नागासेना जी मिल गए. फिर एक सप्ताह तक उन्होंने ही हमारी देखरेख की. अप्रेल में गेस्ट हाउस की कैंटीन बंद थी. सो हम नागासेना जी के साथ मोनेस्ट्री में ही भोजन करते थे. यह चित्र तभी का है. उस वक़्त लद्दाख के पहाड़ों पर बर्फ की सफ़ेद चादर बिछी हुई थी, जो मेरे लिए एक नया अनुभव था. मै बच्चे की तरह बर्फ से ढकीं चोटियाँ देखता रहता था. यह सब अदभुत था.  ...

लेह की बात ही कुछ और है

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लेह लदाख के बारे में पहले मैं अधिक नहीं जानता था. गत वर्ष नवम्बर में एक पत्रकार मित्र, वंदना शुक्ला, के आग्रह पर मैं एक बौद्ध भिक्षुक भिक्षु संघसेना से चंडीगढ़ के होटल पिकाडिली में मिला. वे महाबोधि इंटर्नेशनल मेडिटेशन सेंटर, लेह-लदाख के संस्थापक निदेशक हैं.  यह संस्थान लदाख क़ी गरीब व अनाथ लड़कियों को शिक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. लेह स्थित महाबोधि स्कूल से दसवीं करने के बाद इन बच्चों को आगे पढने में प्रोब्लम थी. सो गुरूजी ने चंडीगढ़ में एक गर्ल्स होस्टल खोल दिया. तीस से अधिक लड़कियां रामगढ़ स्थित इस हॉस्टल में रह कर चंडीगढ़ पंचकुला के कॉलेजों में स्टडी कर रही हैं. इस वर्ष इनकी संख्या पचास से अधिक हो जाएगी. गत अप्रेल में मुझे लेह जाने का अवसर मिला. ब्रिटिश सिंगर मिली मूनस्टोन एवं उनके वकील दोस्त अर्जेंटीना निवासी अलेजांद्रो ग्रिसोसकी भी साथ थे. सड़क मार्ग पर बर्फ जमा थी, इसलिए हम दिल्ली से गोएयर क़ी फ्लाईट से लेह पहुंचे. वहां बर्फ से लदे ऊँचे पहाड़ देखकर मजा आ गया. अदभुत नज़ारा था. ऊँचे पहाड़ पर चढ़ कर हमने फोटोग्राफी क़ी और ...

समंदर की लहरों पे ज़िन्दगी

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मैदान के लोग रोजमर्रा की ज़िन्दगी में समंदर की विशालता और उसकी मस्ती के बारे में उतना नहीं जानते जितना की बोम्बे के लोग समझ पाते हैं. मैं जब भी मुंबई जाता हूँ तो समंदर में कुछ वक़्त बिताने का कोई मौका नहीं छोड़ता. पिछली बार मैं अपने कुछ बिसनेस फ्रेंड्स के साभ जुहू के एक शानदार होटल में रुका था. कामकाज से फुर्सत मिलने पर मैंने एलिफेंटा केव्स चलने का प्रस्ताव रखा तो सब ख़ुशी ख़ुशी तैयार हो गए.  गेटवे ऑफ इंडिया से हमने मोटरबोट ली और हो लिए सवार समंदर की लहरों पे. एलिफेंटा केव्स मुंबई से कुछ किलोमीटर की दूरी पर हैं. यह एक पर्यटन स्थल है जहां प्रतिदिन भारी संख्या में सैलानी पहुँचते हैं. हमारे पास समय कम था इसलिए वहाँ घूमने की बजाय हम तत्काल ही वापस लौट पड़े. वापसी में हवा का रुख हमारी तरफ था, इसलिए बोट हिचकोले लेने लगी. मैं एकदम आगे जाकर लहरों की उछलकूद का आनंद लेता रहा.