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Dalai Lama लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

खुश रहने के कितने पैसे लगते हैं?

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वर्तमान में जिएं  और   प्रसन्न रहें  : भिक्खू संघसेना एक पत्रकार मित्र की फेसबुक पोस्ट देखी तो मैं सोच में पड़ गया। उनकी पत्नी ने लिखा था - ' एक अच्छी फैमिली फोटो , क्योंकि हम अक्सर एक साथ समय नहीं बिता पाते हैं और एक शादी के मौके पर हम आज इतने खुश हैं , जितना पहले कभी नहीं थे … बंगाली शादियां होती ही ऐसी हैं , वे आपको बेहद खुश कर देती हैं। ' मित्र पत्रकार हैं , तो जाहिर है कि परिवार को कम ही समय दे पाते होंगे। पत्रकारों का जीवन होता ही ऐसा है। दुनिया भर की खुशियों और गम में शरीक होते हैं , पार्टियों में जाते हैं , देश - विदेश भी घूम आते हैं , लेकिन अकेले ही। न तो इतनी छुट् ‌ टी मिल पाती है , न इतने पैसे होते हैं कि मनचाहे ढंग से परिवार के साथ घूम - फिर सकें। कहीं दूर चले भी गये तो वापस लौटने पर कुर्सी मिलेगी या छिन जायेगी , इसकी धुकधुकी अलग से लगी रहती है। शाम दफ्तर में बीतती है और पूरा शहर जब सो जाता है , तब घर...

तालियां बजा बजा कर लेते हैं शिक्षा

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दलाई लामा मंदिर। धरमशाला के पास मैक्लोडगंज में। सीक्योरिटी चैक के दौरान चटाक-चटाक आवाजें आयीं। लगा कोई कुश्ती जैसा खेल चल रहा है। जिज्ञासा अंदर पहुंच कर शांत हुई।  मंदिर ग्राउंड में बीसियों बौद्ध भिक्षु एक-दूसरे के सामने खड़े होकर तिब्बती भाषा में कुछ बहस कर रहे थे। कुछेक सेकंड मंत्र सा पढ़कर खड़ा भिक्षु बैठे साथी के चेहरे के पास जोर से ताली बजा रहा था। ऐसा लग रहा था, मानो वो हमला कर रहा हो।  धार्मिक वाद-विवाद की यह तिब्बती परंपरा है। कुछ महिला भिक्षु भी ऐसा कर रही थीं। अनेक विदेशी तिब्बती भिक्षु भी इस रिचुअल में शामिल थे। काफी तामझाम के साथ एक विदेशी फिल्म टीम भी वहां इस सब की शूटिंग कर रही थी। दिलचस्प नजारा था। मैं वहां कोई दो घंटे तक रहा। मेरे लिए यह सब अजीब था। अच्छा लगा।