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कैलाश खेर को पसंद है जीरा-आलू की सब्जी और अरहर की दाल

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कैलाश खेर बॉलीवुड के ही नहीं, आध्यात्मिक एवं सूफी गायन के क्षेत्र में भी भारत के सर्वोच्च सितारों में से एक हैं। अपनी बुलंद और दिलकश आवाज़ से वह वातावरण में एक उच्च स्तर की ऊर्जा उत्पन्न करने में सक्षम हैं। उनकी आवाज़ बाकी सब गायकों से एकदम अलग है। वह भगवान शिव के परम भक्त हैं। मंच पर प्रस्तुति देते समय वह अक्सर एक डमरू साथ रखते हैं, जो भगवान शिव को प्रिय है।  उनके बैंड का नाम कैलासा है और कैलाश पर्वत पर शंकर जी का वास है, यह सर्वविदित है। कैलाश जी एक आध्यात्मिक कलाकार हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी पसंद करते हैं। देश-विदेश के अनेक उत्सवों में कैलाश खेर और प्रधानमंत्री मोदी को प्राय: एक ही मंच पर साथ देखा गया है। ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु जग्गी वासुदेव का महाशिवरात्रि उत्सव हो अथवा ऋषिकेश में परमार्थ निकेतन का अंतर्राष्ट्रीय योग महोत्सव, शिव का आह्वान कैलाश जी की मधुर आवाज़ से ही होता है। मेरा सौभाग्य है कि मुझे कैलाश खेर जी का सान्निध्य और स्नेह प्राप्त है। दैनिक भास्कर में मेरे पूर्व सहकर्मी अजय गर्ग मुंबई में पत्रकारित...

खुश रहने के कितने पैसे लगते हैं?

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वर्तमान में जिएं  और   प्रसन्न रहें  : भिक्खू संघसेना एक पत्रकार मित्र की फेसबुक पोस्ट देखी तो मैं सोच में पड़ गया। उनकी पत्नी ने लिखा था - ' एक अच्छी फैमिली फोटो , क्योंकि हम अक्सर एक साथ समय नहीं बिता पाते हैं और एक शादी के मौके पर हम आज इतने खुश हैं , जितना पहले कभी नहीं थे … बंगाली शादियां होती ही ऐसी हैं , वे आपको बेहद खुश कर देती हैं। ' मित्र पत्रकार हैं , तो जाहिर है कि परिवार को कम ही समय दे पाते होंगे। पत्रकारों का जीवन होता ही ऐसा है। दुनिया भर की खुशियों और गम में शरीक होते हैं , पार्टियों में जाते हैं , देश - विदेश भी घूम आते हैं , लेकिन अकेले ही। न तो इतनी छुट् ‌ टी मिल पाती है , न इतने पैसे होते हैं कि मनचाहे ढंग से परिवार के साथ घूम - फिर सकें। कहीं दूर चले भी गये तो वापस लौटने पर कुर्सी मिलेगी या छिन जायेगी , इसकी धुकधुकी अलग से लगी रहती है। शाम दफ्तर में बीतती है और पूरा शहर जब सो जाता है , तब घर...

चिड़ियाघरों में जीव-जंतुओं संबंधी किताबें भी मिलनी चाहिए

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दलाई लामा की निगाह में करुणा यानी कम्पैशन सबसे महत्वपूर्ण मानवीय गुण है। पशु-पक्षियों के मामले में तो यह और भी सटीक है। वे बोल कर अपनी परेशानी हमें नहीं बता सकते। मूक जीवों के प्रति दया और करुणा का भाव रहे, इसके लिए जागरूकता जरूरी है। चिड़ियाघर इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। देश भर में करीब डेढ़ सौ चिड़ियाघर एवं प्राणी उद्यान हैं। खुली हवा, घना जंगल उत्तरी भारत का एक बड़ा चिड़ियाघर चंडीगढ़ से 20 किलोमीटर की दूरी पर छतबीड़ में है। यह पंजाब सरकार के अधीन है और जीरकपुर के नजदीक स्थित है। वर्ष 1970 में इसका निर्माण शुरू हुआ और 13 अप्रैल 1977 को तत्कालीन राज्यपाल, महेंद्र मोहन चौधरी ने इसका उद्घाटन किया। उन्हीं के सम्मान में इसे महेंद्र चौधरी जूलॉजिकल पार्क नाम दिया गया। शुरू में कुछ जानवरों को असम के गुवाहाटी जू से लाया गया था। यह कई हेक्टेयर क्षेत्र में फैला एक सुव्यवस्थित चिड़ियाघर है, जहां 100 से अधिक किस्म के वृक्ष हैं और सैकड़ों प्रजातियों के 1300 से अधिक जीव-जंतु यहां रहते हैं। पैदल घूमने का आनंद पार्क में बैटरी चालित वाहनों पर बैठकर यहां से वहां जा सकते हैं...

क्या लिखूं आज? जाम लगा है।

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इतना कुछ हो रहा है। कुछ भी नहीं हो रहा। समय बदल रहा है। सब रुका पड़ा है। चुटकी बजाते चीजें हाजिर हैं। नहीं मिलतीं, यही तो दिक्कत है। पैसा बहुत है इस देश में। बस पैसा ही तो नहीं है। जो चाहो वो खा लो। जहर मिला है हर चीज में। दूध, सब्जी, फल खाने चाहिए। क्यों, जहरीले हैं इसलिए?  गरमी रिकॉर्ड तोड़ रही है। तो क्या, कोक पेप्सी है न। पियो, फिर डाइबिटीज झेलो। कैंसर भी तो चलन में है।  बाजार पटे हैं कैंसर की चीजों से। हर चीज में कैमिकल। हर चीज से कैंसर। अखबार यही बताते हैं। उधर इनके विज्ञापन भी छापते हैं। तभी तो अखबारों पर संकट है। सोशल मीडिया सब खा गया। सबके हिस्से की खबर। सबके हिस्से का ज्ञान। सब ज्ञानी हैं। डाइबिटीज और मोटापे से परेशान भी। देखा-देखी में करते हैं शॉपिंग। शान बघारने को। नकली खाना। नकली जिंदगी। असली रोग। असली झगड़े।  क्यों नहीं होते शांत? कश्मीर से पूछते हो? भई, सीएम हो तो महबूबा मुफ्ती जैसी। कोई काम ही नहीं। हर काम पत्थरबाज करते हैं। पैसे मिलते हैं न। घर चलता है। सरकार कौन सा जॉब दे रही है? कामधंधे की जगह सेना लगा दी। अबदुल्ला के पास सॉल्युशन है। खाक सॉ...

कौवे ही क्या, सभी पक्षियों को जीने का हक है

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ननिहाल के गांव में बीते थे बचपन के दिन। ढाक के पत्तों से जूते बनाते थे हम। पाकड़ के चौड़े पत्ते की फिरकी। और खेतों की जुताई के समय मामाजी के साथ पूरा दिन ट्रैक्टर की सवारी। मटर के खेत में मस्ती करते थे। मीठी हरी मटर छील कर खाते थे। उसके नीले, बैंगनी चटख फूलों के बिछौने पर लेट जाते थे।  शमशान वाले पेड़ पास में ही थे। कभी कभार वहां किसी की चिता भी रही होगी। मैंने देखा किसी को नहीं। पर, उधर जाते हुए डर सा लगता था। रात तो छोडि़ए, दिन में भी। घने वृक्षों पर मोरों का बसेरा था। ओह, क्या बोलते थे वो। केऊ केऊ की आवाजें रात में बहुत आती थीं। और, तीसरे पहर को पुड़ुकिया की आवाज। अब हम उसे पेंडुकी कहते हैं। मटमैले रंग की इस चिडिय़ा को कुछ लोग फाख्ता भी बोलते हैं। उसकी आवाज बड़ी निराशाजनक होती थी। सुस्ताई सी दोपहरी। ढलता सूरज। ऊपर से खीज पैदा करने वाली कुकुऊकू.. कुकुऊकू। मुझे पेंडुकी नहीं पसंद। तभी से। पिता जी सरकारी शिक्षक थे। उनका तबादला होता रहता था। दबंग किस्म के थे। हाथ में बेंत। चमड़े का बैग। छोटी तराशी हुई मूंछें। ऊपर को काढ़े हुए बाल। किसी रौबदार दारोगा जैसे दिखते थे। तभी तो देर...

फिर तो हिंदी की गंगा बहेगी

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हिंदी के लिए एक अच्छी खबर है। हमारे प्रधानमंत्री जी हिंदी में बोलते हैं। अब लगता है कि राष्ट्रपति भी हिंदी में भाषण दिया करेंगे। केंद्र सरकार के अनेक मंत्री हिंदी में बात करते हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जी की हिंदी तो लाजवाब है। एकदम संस्कृतनिष्ठ, शुद्ध हिंदी। सुन कर आनंद की अनुभूति होती है। वहां के पिछले दोनों मुख्यमंत्री हिंदी बोलते तो थे, लेकिन देहाती लहजे में। मायावती तो एक-दो लाइन भी बिना पढ़े नहीं बोल पाती हैं। मुलायम सिंह की हिंदी माशा अल्लाह। शब्द गोल-गोल होकर उनके मुंह में ही कुश्ती लड़ते रहते थे।   दरअसल, आधिकारिक भाषाओं पर संसद की समिति ने हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए 117 सिफारिशें की थीं। छह साल बाद, इनमें से कुछ अब अमल में आने की संभावना बनती दिख रही है। राष्ट्रपति ने कई सिफारिशों पर अपनी सहमति जता दी है। यदि यह निर्णय लागू हो गया तो सरकारी कामकाज में हिंदी का दबदबा बढ़ेगा। नेता और अधिकारियों के लिए हिंदी में लिखना-बोलना अनिवार्य हो जायेगा। होना भी चाहिए। हिंदी हमारी राजकीय भाषा है। देश का बड़ा तबका हिंदी में ही अपनी बात कहता-सुनता है। ...

बेटी, मैं हर वक्त तुम्हारे साथ हूं

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कल एक फोन आया। करीब तीस साल बाद सुनी वो आवाज। तब वेे जिला सूचना अधिकारी हुआ करते थे मेरे शहर में। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे मैंने अपने एक मित्र के साथ मिलकर अपने स्कूल में एक प्रदर्शनी लगायी थी- "अखबार और तकनीक" विषय पर।  वे मुख्य अतिथि थे।  उनके हिसाब से देश में शायद अपनी तरह का पहला आयोजन था वो। सब कुछ रील की तरह घूम गया दिमाग में।  औपचारिक बातचीत के बाद उन्होंने बड़े ध्यान से बेटियों से जुड़ा एक अच्छा संदेश दिया। मन को छू गयी वो बात। बोले, हर पिता को अपनी बेटी से यह अवश्य कहना चाहिए कि-  "बेटी, मैं हर वक्त तुम्हारे साथ हूं। तुम्हारे हर सही-गलत निर्णय में तुम्हारे साथ हूं। तुम जो करना चाहोे। मैं हमेशा तुम्हारी ताकत बनकर रहूंगा। मैं इस घोंसले में तुम्हारी ताकत हूं ।  जब तुम दूर चली जाओगी, तुम्हारा नया घोंसला होगा, तब भी मैं तुम्हारी ताकत रहूंगा। बेटी मैं सदैव तुम्हारे साथ हूं और  हमेशा तुम्हारी ताकत  रहूंगा।" सच में, एक पिता के तौर पर बेटियों को यदि यह अहसास कराया जाये कि वे कभी भी अकेली नहीं हैं, तो उनका मनोबल बढ़ा रहेगा। वे अपने स...

गोबर के कन्हैया, अन्नकूट के पहाड़

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गोवर्धन पूजा। अन्नकूट। आज है। कन्हैया ने गोवर्धन पर्वत उठाया। छोटी उंगली पर। भारी बारिश से प्रजा की रक्षा हेतु। भागवत पुराण में वर्णन है। वल्लभ सम्प्रदाय के लिए पूजा का खास दिन।  Lord Krishna raising the Govardhan Parvat on his finger. (Source: Unknown) अन्नकूट यानी प्रभु को भोजन के पहाड़ समर्पित करना। धन्यवाद करने की एक विधि। आपने हमें भोजन दिया, उसके लिए धन्यवाद। स्वामीनारायण सम्प्रदाय के लिए महत्वपूर्ण दिन। गौड़ीय सम्प्रदाय के लिए भी।  हम भी बनाते थे गोबर से भगवान के विविध रूप। आंगन में सजाते थे। गांवों में अब भी होता है ऐसा। बाजार की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं। होगी भी क्यों। गोबर कितने में बिकेगा। शॉपिंग माल में तो हर्गिज नहीं। फिर क्यों मनायें। इसीलिए शहरी लोग कम ही जानते हैं इसे।  मुझे याद है। मां गोबर से घर लीपती थीं। गांव के घर का कच्चा फर्श। पीली मिट्टी मिलाते थे गोबर में। फर्श पर निखार आ जाता था। पीला मिट्टी लेने मैं भी जाता था बड़ों के साथ। बैलगाड़ी में बैठकर। अच्छे दिन थे वे। सरल जीवन। परम्पराओं का निर्वाह। आपसी मेलजोल। भाईचारा। याद है सब। परम्...

साइकिल पर हिमालय

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सैकड़ों किलोमीटर पैडल मारते हुए दुनिया की सबसे ऊंची सड़क पर पहुंचना किसी भी साइकिल सवार का सपना हो सकता है। इस सपने को हकीकत में बदला मनाली-खारदूंगला साइकिलिंग चैम्पियनशिप 2015 में भाग ले रहे 63 साइकिल सवारों ने। इनकी यात्रा शुरू हुई जुलाई के अंतिम सप्ताह में मनाली के जवाहर चौक से, जिसका समापन हुआ खारदूंगला पर, जिसे दुनिया का सबसे ऊंचा मोटरेबल दर्रा होने का गौरव प्राप्त है। चैम्पियनशिप के आयोजक नॉर्दर्न एस्केप्स के संस्थापक गौरव शिमर के लिए यह एक बेहद संतोषजनक क्षण था। छोटी-मोटी परेशानियों को छोड़कर अन्य कोई बड़ी दुर्घटना पेश नहीं आयी। हालांकि, रेस समाप्त होने के अगले ही दिन लेह में भारी बारिश के चलते मनाली और श्रीनगर राजमार्ग जरूर बंद हो गये। इस कारण से चंडीगढ़ और दिल्ली की ओर वापसी की यात्रा प्रभावित हुई। आर्मी ने तो तीन दिनों के लिए लद्दाख में बादल फटने जैसी घटनाओं की आशंका के चलते चेतावनी भी जारी कर दी थी। हालांकि, ऐसी कोई अनहोनी हुई नहीं। सिवाय इसके कि एक दिन के लिए लेह आने-जाने वाली सभी उड़ानें बंद रहीं। पुरुष वर्ग में चैम्पियनशिप जीतने में कामयाब रहे पी. बी. प्रधान, जब...